Monday, 9 April 2018

एंग्री यंग मैन का तिलिस्म तोड़ते- मोहन जोशी और मि. पिंटो

  ‘मोहन जोशी हाजिर हो’ औरअल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’, ये दो फिल्में नहीं बल्कि दो आईने हैं, जो समाज के एक ही बिम्ब को उकेरते हैं। दोनों ही आम इंसान की उम्मीद, मायूसी, दौड़, थकान, गुस्सा और गुस्से को दबाए रखने की विवशता हैं। वैसे अस्सी के दशक में आने वाली ये दोनो फिल्में एंग्री यंग मैन को चुनौती देती हैं और कहती हैं कि उत्तेजित करने वाले बड़े-बड़े संवाद बोले बिना और माथे पर बल दिए बगैर, निर्भाव रूप से भी गुस्सा जाहिर किया जा सकता है। साथ ही यह भी कहती है कि संघर्ष के लिए यंग होना जरूरी नहीं क्योंकि इन फिल्मों में दो बुजुर्गों के जरिए समाज का स्याह चरित्र उजागर किया गया है।
  70-80 के दशक में देश सिर्फ राजनैतिक अस्थिरता से ही नहीं जूझ रहा था, बल्कि आम आदमी भी अपने कमजोर होते अधिकार और अस्थिर होती जरूरतों से जूझ रहा था। नारा जरूर गरीबी हटाओं का था लेकिन हटाए जा रहे थे या यूं कहिए ढहाए जा रहे थे, आम इंसान की इच्छाएं, उसके सपने और उसकी जिजीविषा। इन सबके बावजूद तीन जवान बच्चो के पिता मिस्टर पिंटो (अल्बर्ट पिंटो के पिता) और रिटायर मोहन जोशी अपने अधिकारों की  लड़ाई लड़ना तय करते हैं। वैसे लड़ाई भी क्या, मोहन जोशी अपने चॉल की मरम्मत कराने के लिए न्यायलय का दरवाजा खटखटाते हैं और मि. पिंटो अपने बोनस के लिए दूसरे साथी मजदूरों के साथ हड़ताल पर जाते हैं।
       

      जिस तरह कोई भी पिता अपने जवान बेटे से अपने मन की बात कहता है, उसी तरह मि. पिंटो भी अलेबर्ट (नशीरुद्दीन शाह) को अपने हड़ताल पर जाने की वजह बताते हैं, “28 बरस तक उस मिल में काम किया मैं, उस मिल का शोर मेरे भेजे में घुस गया....जीना मुश्किल हो गया, फिर भी चुप रहा....फैमली को देखना था, बच्चे लोग को बड़ा करना था, हो सकता है इसीलिए मुंह बंद किया, काम करता रहा...इज्जत से जीने को नहीं मिला, फिर भी चुप रहा...इस इस्ट्रईक से क्या मिलने वाला है ये पता नहीं, लेकिन एक चीज मैं सोंचा हूं, मेरे को लड़ना है। यह महज संवाद नहीं यह बिंब है उस आम आदमी का, जो अपने सम्मान की कीमत पर अपने परिवार का भरण-पोषण करता है। ऐसा नहीं कि लड़ने का साहस नहीं उसमें, लेकिन उसकी जिम्मेदारियों ने उसके साहस को सारी उम्र बांधे रखा।
  इसी तरह मोहन जोशी भी न्याय पाने की जिद्दोजहद में व्यवस्था के कुचक्र में फसता जाता है, लंबे समय तक उम्मीदों की पगडंडियों पर चलते- चलते जब उसकी क्षमता जवाब देने लगती है, तो कह उठता है, उफ्फ….कैसी थकान है ये, मन टूटता है तो ससुरा शरीर भी टूटने लगता है, आखिर कब तक नहीं टूटता... यहां मोहन जोशी अनकहे शब्दों में कह देता है कि उम्मीदों को ढोना इतना आसान नहीं है, ये भी अजीब सी थका देने वाली प्रक्रिया है, जिसमें शरीर ही नही मन भी थक जाता है, लेकिन संघर्ष चलता रहता है।
              

  इस तरह ये दोनो फिल्में अपने दौर के एंग्री यंग मैन का तिलिस्म तोड़ती हैं और बताती हैं कि गुस्सा उम्र का मोहताज नहीं होता है, ये हर उम्र में हो सकता है और ये भी जरूरी नही कि  यह युवा अवस्था में किसी बेहतर कल की उम्मीद में ही फूटे। मि. पिटों और मोहन जोशी ने तो अपनी लड़ाई तब शुरू की जब वह लगभग अपनी जिम्मेदारियों से निज़ात पा चुके थे और उनके आज और कल का फासला कमज़ोर हो चुका था।
  फिर भी सवाल बचता है कि अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है? दरअरल उसे गुस्सा तब नहीं आता जब उसका पिता मिल मजदूरों के साथ हड़ताल पर जाता है, उसे गुस्सा तब नहीं आता जब उसका भाई जेल जाता है, उसे गुस्सा तब भी नहीं आता जब उसका पिता हड़ताल के कारण सेठ के गुंडों से पिट कर आता है। यहां अल्बर्ट पिंटो भी अपने गुस्से से 70-80 के दशक के एंग्री यंग मैन को चुनौती देता है। अल्बर्ट को अपने बाप के पिटने पर गुस्सा नहीं आता और ही वह गुडों से बदला लेने दौड़ पड़ता है लेकिन उसे सत्ता के झूठ पर गुस्सा आता है। उसे गुस्सा तब आता है जब मोहन जोशी न्याय पाने के लिए अपने ही चॉल के छत के चूले हिला-हिला कर धराशाई हो जाता है, उसे गुस्सा तब आता है जब उसके पिता और उनके साथियों के जायज मांगों को देश में विदेशी मुद्रा की कमी का कारण बताया जाता है और उनके हड़ताल को नजायज करार दिया जाता है।

  थोड़ा महसूस करिए ऐसे कितने मोहन जोशी और अल्बर्ट पिंटो अपने गुस्से के साथ हम सब के अंदर हैं। क्या फर्क पड़ता कि वो बीसवीं सदी का आठवा दशक था और ये इक्कीसवीं सदी का दूसरा दशक है। परिस्थितियां कुछ खास नहीं बदली, तभी तो मोहन जोशी और अल्बर्ट पिंटो दोनो ही अपने से लगते हैं।