Sunday, 28 January 2018

क्योंकि सभ्यताएं जीवन से फलती-फूलती हैं जौहर से नहीं

क्योंकि सभ्यताएं जीवन से फलती-फूलती हैं जौहर से नहीं


तमाम विरोध प्रर्दशनों के बीच पद्मावत रिलीज हो गई, लोगो ने अपने-अपने हिसाब से इसकी प्रशंसा और निंदा की इसी बीच संजय लीला भंसाली के नाम स्वरा भास्कर का खुला पत्र भी आ गया। लेकिन हमें कुछ सवालों पर चर्चा करने की सख्त ज़रूरत है, कि जो इतिहास हम जानते और समझते हैं वो कितना शुद्ध है? जिन योद्धाओं का हम महिमा मंडन कर रहे हैं वो कितने वीर थे? ज़िन्दगी या जौहर मे से किसे चुनना वीरता है? 
दरअसल इतिहास नंगी आंखों से नहीं देखा जा सकता, इसीलिए इतिहास की शुद्धता की उम्मीद करना भी तर्क संगत नहीं होगा हम इतिहास को हमेशा किसी न किसी चशमें से देखते हैं वो चशमा कभी जायसी होते हैं तो कभी भंसाली। कभी - कभी रचनाकार अपनी रचनात्मकता और अपने विचारों को तर्क संगत बनाने के लिए अपने नायक और नायिकाओं को तमाम गुणों से सुसज्जित कर देते है और किसी आम व्यक्ति को योद्धा बना देते हैं। अब ये विचार करने योग्य तथ्य  है कि जब ये योद्धा इतने वीर थे, तो इनके राज्य मे किसी जौहर कुंड की क्या जरूरत थी, क्या जौहर कुंड का होना यह नहीं दर्शाता कि इन योद्धाओं को अपनी विजय पर भरोसा नहीं था। हारने की स्थिती मे इनकी रानियां राज्य की अन्य स्त्रीयों सहित इन जौहर कुंडों में सामुहिक आत्महत्या कर लेती। फिर इतिहास ने इसका महिमामंडन किया और इसे मर्यादा और सम्मान की रक्षा का नाम दे दिया। कितना भीषण और विभत्स दृश्य रहा होगा इतनी बड़ी संखाया में स्त्रीयों द्वारा सामूहिक आत्महत्या। शायद इसकी भीषता के कारण ही बाद के राजपूत राजाओं ने अकबर के सुलहकुल की नीति अपनाई होगी, हालांकि ये बात दावे के साथ नहीं कही जा सकती क्योंकि इतिहास इस बारे मे मौन है। 

यहां उद्देश्य हमारी धरती के योद्धाओं की वीरता पर सवाल खड़े करना बल्कि इतिहास को तर्क संगत दृष्टी से देखना है
अब अगला सवाल ये खड़ा होता है कि जीवन या जौहर में किसे चुनना वीरता है। वैसे ईसा पूर्व चौथी सदी में ही चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र गुप्तचर व्यवस्था का वर्णन किया है, चाणक्य ने गुप्तचर विभाग में विष कन्याओं को रखने की बात की है। यदि खिलजी रानी पद्मिनी के रूप से इतना मुग्ध था तो वो निश्चय ही कमज़ोर चरित्र का रहा होगा फिर ऐसी स्थिती में राजपूत योद्दाओं ने अपनी गुप्तचर स्त्रीयो का लाभ उठा कर खिलजी की सेना को कमज़ोर क्यूं नहीं किया? या शायद तेरहवीं सदी, ईसा पूर्व चौथी सदी के चाणक्य को भूल गया था या तेरहवीं सदी को चाणक्य अप्रसंगिक लगता होगा।
शायद तेरहवीं सदी तक आते-आते राजपुताना मान- मर्यादा, राजपूतों की भुजाओं और राजपुतानियों की योनिकता में बसने लगी थी। फिर यहां एक सवाल खड़ा होता है कि यदि ऐसा था तो जिस तरह योद्धाओं को युद्ध कला का प्रशिक्षण दिया जाता था, उसी तरह राजपूत स्त्रीयों को भी यह प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए था कि किस तरह विवेक और साहस के साथ शत्रु के गुप्तांगों पर प्रहार करना है और उसे नपुंसक बनाना है । ज़रा सोंचिए अगर ऐसा होता तो शायद इतिहास ये कहता कि राजपूत योद्धाओं के हार के बावजूद राजपूत स्त्रीयों ने खिलजी सहित उसकी पूरी सेना को नपुंसक बना दिया। क्या इस बात से हमें इतिहास पर गर्व न होता, बिल्कुल होता। अब आप कह सकते हैं कि यहां हवाई किले बनाए जा रहे हैं, लेकिन साहब इसका क्या प्रमाण है कि हम जिसे ऐतिहासिक दस्तावेज समझ रहें हैं वे वास्तव में दस्तावेज हैं, वो किसी रचनाकार की मात्र कलात्मक अभीव्क्ति भी हो सकती है। मगर क्या करें हमारा इतिहास भी तो पुरूषो का, पुरूषों के द्वारा, पुरूषों के लिए है, जहां स्त्रीयों
का शौर्य केवल जौहर तक है।
अब युद्ध और युद्द की परिस्तिथियों पर भी गौर करने की जरूरत है। क्या दुश्मन या युद्ध इतना क्रूर और अततायी होता है कि उसमें जीवन की संभावना ही न बचे। अगर ऐसा होता तो दूसरा विश्व युद्ध ऑस्कर शिंडलर की कहानी न कहता, जर्मन होते हुए भी जिसने हजारों यहुदियों को बचाया। भारत-पाकिस्तान के बटवारे के दौरान किसी जेनिब को बूटा सिंह भी न मिलता। इसी बटवारे के कारण जब जहर का कर या कुएं में कूद कर औरते जौहर कर रही थी तो पिंजर की पूरों ने रासिद को अपनाया था (पिंजर के पात्र काल्पनिक भले हों लेकिन ये उस दौर का सच है)। तमाम युद्ध की विभिषिकाओं के बीच ज़िन्दगी अपने लिए रास्ते तलाश लेती है। हलांकि ये सच है कि इतिहास रानी पद्मावति के जौहर को नज़रअंदाज नहीं कर सकता जिसने जीतने के बाद भी दिल्ली के सुल्तान को हरा दिया था। लेकिन इक्कीसवीं सदी में जौरह का महिमा मंडन समझ से परे है, क्योंकि इस बात में कोई शक नहीं कि सभ्यताएं जीवन से फलती-फूलती हैं जौहर से नहीं।